मानव जीवन में मोक्ष की जिज्ञासा, प्रासंगिकता एवं महत्व:
एक दर्शनशास्त्र्h; सामय्ािक
विश्लेषण
महेन्द्र कुमार प्रेमी
पी-एच.डी. शोध-छात्र, तुलनात्मक धर्म ,दर्शन एवं योग अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर, छŸाीसगढ़
सारांश-
जीवन के आरंभिक काल से ही मोक्ष मानव जीवन के लिए एक जिज्ञासा का विषय रहा हे। मानव अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य तथा उसके परिणाम को जानने की अनोखी जिज्ञासा रखते हैं। उन्होंने सर्वप्रथम यह विचार किया कि मानव जीवन में आत्मा नामक एक अति विशिश्ट अदृश्य व्यक्तित्व वाले शख्स निवास करता है, शरीर का जन्म होता है तथा मृत्यु भी निश्चय है लेकिन आत्मा का अंत नही होता बल्कि मानव के अपने जीवन काल, में शारीरिक कर्मो का फल उसे ही भोगना पड़ता है। इस प्रकार से जन्म एवं मृत्यु का चक्र लगातार चलता रहता है। आत्मा को अविनाशी माना गया है। क्योंकि आत्मा न तो मरता है और न ही जन्म लेता है जबकि मानव का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक दुःखों से भरा रहता है उन्हें हर पल दुःखों का सामना करना पड़ता है। तो यहां पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न खडा होता है कि तो किसका उद्धार होता है। आत्मा का या शरीर का ? अर्थात दुःख से छुटकारा किसको मिलती है? सामान्य शब्दांे में मानव उसी प्रश्न के उत्तर के लिए अपना खोज आरंभ करता है यही से शुरू होती है मोक्ष हेतु अभियान।
आदि वैदिक साहित्य ग्रंथ से लेकर आज के आधुनिक वैज्ञानिक खोज से तथा अनेकों प्रयोंगों से यह पता चलता है कि मानव जीवन में आत्मा रूपी एक अविनाशी शख्स निवासरत् है जो मानव के जन्म से लेकर उसके मृत्यु होने के पश्चात् शरीर को छोड़कर चला जाता है और इधर-उधर भटकता रहता है (संसार में ) तब-तक भटकता रहता है जब-तक कि उसे मुक्ति नही मिल जाती या सामान्य शब्दो में उसका उद्धार नहीं हो जाता।
प्रस्तावना
मोक्ष का यह विषय एक अत्यंत रहस्यात्मक है एवं रोचक तथा जिज्ञासा से भरा हुआ है। मानव मन में यह विचार आने लगता है तथा वह अपने - आपसे यह प्रश्न करता है कि आखिर आत्मा है क्या? आत्मा आखिर में कहाँ से आती है और कहाॅं जाती है ? यह विभिन्न प्रश्न जिज्ञासा का विषय बनी हुई है। आरंभ से ही उन प्रश्नों के उत्तर के खोज में एक मात्र और अंतिम विकल्प के रूप में सर्वशक्तिमान ईश्वर को माना गया है। जिसका न तो आदि है और न ही अंत। वही है जो आत्माओं को जन्म देता है और निश्चित समय पर उसे पुनः वापस ले लेता है। यहां पर ध्यान देने वाली यह आवश्यक तथा सर्व सम्मति से स्वीकृत है कि ईश्वर आत्माओं का पिता है जिसे परमआत्मा या सृष्टि के सवमी कहा गया है।
मोक्ष के विषय मंे ईश्वर ही एकमात्र सत्य है जो समस्त जीव एवं आत्माओं को मोक्ष या छुटकारा प्रदान कर सकता है क्यांेकि मनुष्य अपने समस्त प्रयासों से भी स्वयं मोक्ष प्राप्त नही कर सकता चाहे कितना भी कुछ कर ले सब बेकार और निरर्थक है, असंभव है। इसी कड.ी में ईश्वर ने मानव के आत्मा के लिए दो स्थान ठहराया है जो मानव अपने जीवन भर कार्य करता है उसके बाद उसकी मृत्यु हो जाती है शरीर तो नाशवान है लेकिन आत्मा अविनाशी अतः आत्मा शरीर द्वारा किये गये कर्मों का फल भोगता है जिसका कर्म अच्छा है वह स्वर्ग में डाला जाता है तथा जिसका कर्म बुरा होता है उसे नरक के भयानक यातना या आग की झील में अनंत पीड़ा के लिए डाला जाता है। यह एक आदिकाल से चली आ रही धार्मिक विचार एवं मान्यता है जो समस्त धर्म के धार्मिक ग्रंथों में पाई जाती है।
मोक्ष विचार मानव मस्तिष्क की उपज है तथा यह लगातार चलने वाली अनोखी जिज्ञासा का विषय है जिसके सच्चाई या रहस्य का ज्ञान अज्ञात है मोक्ष के वास्तविक रहस्य के विषय में अभी तक प्रमाणित सर्वमान्य ज्ञान नही है। धार्मिक मान्यताओं एवं वैज्ञानिक प्रयोंगों से भी अभी तक मोक्ष के विषय में वास्तविक रहस्यों का ज्ञान सजा आदि से आदि एवं प्राचीन से प्राचीन जो सर्व सम्मति से स्वीकार किया गया है। वह है एक मात्र ईश्वर जो सब-कुछ उत्पन्न करने वाला है जो सब कुछ का आधार जगत का नियंता एवं सर्व सामर्थी अनोखा व सारी सृष्टि के सृजनहार।
मोक्ष की जिज्ञासा
मानव मोक्ष के उस रहस्य को जानना चाहता है और अपने उस जिज्ञासा को शंात करने हेतु वह अनेक प्रकार के कर्म अनुष्ठान यज्ञ तथ धार्मिक क्रिया कर्म-काण्ड को अपनाता है। धर्म ग्रंथांे में वर्णित धार्मिक आचरण आज्ञा एवं समस्त नियमों का अनुशरण करने लगता है। मानव मोक्ष हेतु बताए गये समस्त मार्गांें को अपने जीवन में आत्मसात् करने का प्रयास करता है। वह यह विश्वास करता है कि ऐसा करने में निश्चय ही उनको मोक्ष मिलेगा मानव अनेक धार्मिक कर्मो अनुष्ठानांे, यज्ञ, दान तथा पुण्य का काम करता है ताकि वह मोक्ष प्राप्त कर सके और जीवन के समस्त दुःखो से छुटकर जन्म - मरण के चक्र से मुक्त होकर संसार के भव-चक्र से हमेशा-हमेशा के लिए वह अनंत विश्रांति मे पहुंचकर मोक्ष प्राप्त कर ले। मानव अपने इसी जिज्ञासा को अंतिम रूप देने के लिए अनेक धर्मो अर्थात धार्मिक ग्रंथो के उपदेशों आदर्शें आज्ञाओं निर्देशों एवं धार्मिक गुरूओं के शरण में जाकर मोक्ष हेतु याचना करता है तथा शंाति प्राप्त करने का प्रयास करता है। वह अनेक गुरू, उपदेशक, मुनियों, ऋषियों, ज्ञानियों तथा धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से मोक्ष के वास्तविक रहस्य को जानने का प्रयास करता रहता है वह मोक्ष हेतु हर संभव प्रयास करता है।
मानव के मोक्ष के प्रति यह जिज्ञासा उन्हे स्वयं ही मोक्ष हेतु प्रेरित करता है अंततः वह मोक्ष के प्रति अपने आपको समर्पित कर आत्म ज्ञान में लीन हो जाता है। जहाॅ उसका आत्म साक्षात्कार होता है और स्वंय ही यह अनुभव करने लगता है कि उसका मिलन परमात्मा से हो गया है फलस्वरूप आत्म ज्ञान का प्रकाश उन्हंे प्रकाशित कर सत्य का ज्ञान करा देता है। मानव के मोक्ष के प्रति यही जिज्ञासा उन्हंे महान् और सबसे ऊंचा गुण सन्पन्न ज्ञानी आदरणीय एवं सम्मानीय स्थान में लाकर खड़ा कर देता है। अंत में मानव अपने आत्मसाक्षत्कार द्वारा ही मोक्ष के प्रति यही जिज्ञासा उन्हंे महान् और सबसे ऊंचा गुण सन्पन्न ज्ञानी आदरणीय मानव अपने आत्मसाक्षात्कार द्वारा ही मोक्ष के रहस्य को जान लेता है यह सिर्फ व्यक्तिगत अनुभव है इसको प्रमाणित नहीं किया जा सकता। यहां पर व्यक्ति असीम शांति का अनुभव करता है आत्मा एवं परमात्मा का मिलन होता है समस्त दुःखों से निजात मिल जाता है।
मोक्ष की प्रासंगिकता
आज के इस वैज्ञानिक युग में जबकि भौतिकवादी प्रवृत्ति बढ़ी है बहुधा यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या मोक्ष की अवधरणा आज की परिस्थिती में प्रासंगिक है? अर्थात क्या इसकी कोई सामाजिक उपयोगिता स्वीकार की जा सकती है? मोक्ष की अवधारणा पर यह भी आक्षेप लगया जाता है कि वह व्यक्ति को आत्म केन्द्रित बनाती है, स्वार्थी बनाती है यह जीवन के संघर्षों से बचने का एक बहाना ढॅूढ़ंे़ जाने का प्रयास है। ऐसी स्थिति में कुछ लोग या तो मोक्ष जैसी अवधारण को स्वीकार ही नही करना चाहते या फिर मोक्ष की एक अनोखी व्याख्या ही करते है। उनकी नई व्याख्या के अनुसाार मोक्ष एक नैतिक आदर्श है, और इस नैतिक आदर्श के रूप में यह समाज के अन्य लोगों को दुःखों से मुक्ति दिलाने का प्रयास है। इ अर्थ में मोक्ष की प्रासंगिकता स्ीकार की जा सकती है। ऐसी विचारधारा का पोषण करने वाले ’विदेह मुक्ति को स्वीकार नही करते।हाॅ जीवन मुक्त या बोधिसत्व के आदर्श को अवश्य स्वीकार करते है परन्तु वह भी इस सीमा के साथ कि जीवन मुक्ति को पुनर्जन्म या अवतार की धारणा में विश्वास न हो। ऐसे लोग ईश्वर आत्मा,ब्रहन जैसी तात्विक सजा में विश्वास नही रखना चाहते। निश्चित है कि मोक्ष की अवधारणा के आधार को ही समाप्त करके एक नई आवधारणा को जन्म देते है जिसे वास्तव में मोक्ष न कहकर कुछ और नाम दिया जाना चाहिए। उनका इस मोक्ष न कहकर कुद और नाम दियसा जाना चाहिए। उनका इस मोक्ष से मतलब संगठित व्यवस्थितव्व से है, जो एक मनोवैज्ञानिक संकल्पना है। यदि प्राचीन अर्थ में मोक्ष को स्वीकार जैसा कि पुरूषार्थ की श्रेणी में माना गया है, तभी मोक्ष के विषय में विचार करना उपयुक्त होगा। पुरूषार्थ के रूप् में मोक्ष, चाहे वह प्राचीन अवधारणा ही क्यों न हो की भी प्रासंगिकता स्वीकार की जा सकती है। मोक्ष एक आदर्श के रूप में जीवन की साथर्कता है। प्रायः और प्राप्ति के बीच एक गति है। प्रात्य के लिए हमारा सारा प्रयास सदाचार और सद्विचार का ही प्रयास करता है।
व्यक्ति पहले प्राप्त करके ही वितरण करता है। व्यक्ति मुक्त होकर या मुक्त व्यक्ति ही दुसरों को मार्ग प्रदर्शित करता है। मुक्त व्यक्ति आत्केन्द्रित कैसे कहा जा सकता है, जबकि वह ’लोक संग्रह के कार्य करता है। वह तो पहले सिद्ध होता है तब दुसरों को सिद्धि दिलाने का प्रयास करता है वह ’समदर्शी’ होता है। सर्वत्र समदर्शन सब में ईश्वर को देखने वाला स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित कैसे हो सकता है?
अतः सारांश में यही कहा जा सकता है कि प्राचीन पुरूषार्थ की अवधारणा में जो ’मोक्ष’ की अवधारणा है उसे मान लेने पर असकी प्रासंगिकता में कोई कमी नही आएगी। समदर्शी, योगी, ज्ञानी, संत, स्थिति पुज्ञ चाहे जो भी संज्ञा दे ऐसे मुक्त की अवधारण का समाज में अत्यंत महत्व है उसकी उपयोगीता है। आदर्श के रूप में तो मोक्ष सनातन प्रासंगिकता है।
मोक्ष: मानव जीवन का प्रतिक्रियात्मक विचार
‘‘मनुष्य स्वतंत्र है ओर वह अपने कार्यो के लिए स्वयं उत्तरदायी है।’’ सच्ची स्वतंत्रता या मोक्ष अपनी ही अंतरात्मा से प्राप्त करता है। यहां पर सच्ची स्वतंत्रता से तात्पर्य किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति से नही है वरन् अज्ञान की परतो को हटाकर अपने ही स्वरूप की प्राप्ति है। मोक्ष का वास्तविक स्त्रोत स्वयं मनुष्य के अंदर ही छिपी रहती है जब वह अपने आप का सामना करता है अर्थात् अपने वास्तविक गति को जानने की कोशिश करता है जिस प्रकार सागर की अथाह गहराई में जाने पर अनमोल मोती की प्राप्ति होती है ठीक उसी प्रकार जब मनुष्य अपने जीवन रूपी महासागर में डुबकी लगाकर गहराई तक अर्थात् चरम गहराई तक पहुचता है तो उसे स्वयं का आत्मसाक्षात्कार होता है। अज्ञानता की समस्त अंधकार आत्म ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो अपनी वास्तविक स्वरूप को अर्थात् सत्य को पहचान लेता है। मानव अपने चरम गति/स्थिति केा बाह्य एवं आंतरिक दृष्टि से पूर्णस्वरूप से पहचान लेता है। तब उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य स्वयं ईश्वर की एक महान एवं बहुमुल्य सृष्टि है। चाहे आज के आधुनीक, सभ्य, वैज्ञानिक, मानव कितना भी तर्क वितर्क, खण्डन मण्डन करे चाहे वह आकाश पाताल एक कर ले वह ईश्वर को खोज नही सकता न ही ऐसा संभव न है न होगा न था। सारे प्रश्नों, विचारो और तर्क वितर्को का एक ही हल ईश्वर है। अनीश्वरवादी या नास्तिक वैज्ञानीक समाज कितना भी विरोध करें परंतु यह एक कडवी सत्य है िकवह अंतिम में अपने आपको वही सर्वशक्तिमान, सृजनहार ईश्वर के स्वरूप में स्वीकार करेगा। यहा पर यह स्पष्ट कर देना उचित है कि ईश्वर के स्वरूप अर्थात् अपने अस्तित्व के लिए एक मात्र प्रमाण ईश्वर से निकला हुआ, ईश्वर के प्रतिरूप या स्वरूप है। अर्थात् जो आदि और अंतिम निष्कर्ष है।
मानव जीवन दुःखों का पुंज है मानव के अंदर विभिन्न प्रकार के अशुध्दता एवं पाप मनोविकार घृणित इच्छा राग द्वेष, क्रोध, लोभ और हिंसा भाव भरा हुआ है वो कुछ करता है तो अपनी इच्छा पूर्ति या स्वार्थ सुख के लिए करता है और जो कुछ करता है वह बुरा ही करता है। मानव जीवन अथाह पीडा के सागर में गोता खाता रहता है। वह इन्ही सब पीडा रूपी दुःख संताप और असहनीय दास्ता से मुक्त होना चाहता है। लेकिन वह स्वयं में असमर्थ होता है इसी भयंकर पीडाओ के कराहते करूण वेदनाओं से ग्रस्त मानव केा उध्दार के रासते या मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए अपने रूप में गुरू महात्मा अवतार पैगम्बर या एक सच्चा मार्ग दर्शक करने वाला नवी भेजता है। समय समय पर वह अपने संदेश पैगम्बरो या नबियों के माध्यम से मानव जीवन कल्याण अर्थात् मोक्ष के प्रति के लिए सहायक को भेजता है। वे तो सिर्फ मार्ग बताकर जहा से आते है चले जाते है परंतु मानव उस लक्ष्य तक पहुचने में नाकामयाब रहते है क्योकि पाप का स्वभाव या अज्ञानता अनाजकारिता के कारण अंतिम लक्ष्य तक पहुच पाने में सफल नही होता जब तक वह स्वयं के विषय में नही जान लेता अपने अज्ञानता के कारण यो हि सांसारिक अभिलाषाओं में भटकता फिरता बंधन में बुधा रहता है छुट नही पाता। मानव अपने अज्ञानता के कारण अनेक प्रकार के धर्मान्धता में अर्थात् अंधकार में या अंधविश्वास में फस कर सांसरिक दुःखों एवं पीडियों में कराहता मोक्ष की खोज में भटकता फिरता रहता है।
यह बात सत्य है वरन् जीवंत एवं वास्तविकता है जिसे नकारा नही जा सकता क्योकि कोई मनुष्य, मनुष्य को मोक्ष नही दिला सकता क्योकि किसी ने भी ईश्वर को नही देखा, सारे धर्मो में यह सर्वमान्य अवधारणा है कि स्वर्ग और नरक सत्य है, पर कियी ने देखा नही। वे स्वयं के आत्मसाक्षात्कार होने के ज्ञान के प्रकाश के अलौकिक या दिब्य दशर्न अनुभव करता है और दुसरों को भी पे्ररित करता है ज्ञान तथ्य शिक्षा उपदेश और प्रभावशाली वक्तव्य से उनका केवल मार्ग दर्शन कर सकता है। परंतु मोक्ष दिलाने में असमर्थ रहता है। क्योकि एक कहावत के अनुसार कि क्या कोई अंधा अंधे को रास्ते दिखा सकता है। क्योकि दोनो की दुर्गति एक सी है तो क्या दोनो ही गढ्डे मे नही गिरेंगे? ज्ञानी अपने ज्ञान रूपी प्रकाश में यह महशूस कर सकता है कि ईश्वर है और सृष्टि का सृजनहार है। चाहे कितना भी नास्तिक कठोर एवं ईश्वर को नकारने वाले क्यो न हो उसे भी वास्तविकता में ईश्वर को खोजने की जिज्ञासा मन में (हृदय) होती है चाहे कितना इंकार क्यो न करे यह एक कडवी सत्य है। ईश्वर है, ईश्वर सत्य है और सत्य ही ईश्वर है क्योकि ईश्वर के बिना मोक्ष की कल्पना नही की जा सकती। निष्कर्षतः सभी धर्मो में मान्यता है कि मनुष्य ईश्वर से निकलता है (पैदा हुआ है), मोक्ष की अवधारणा से स्पष्ट है कि मनुष्य ईश्वरीय रूप है जो पाप अनाज्ञाकारिता के कारण मुल रूप से अपने वास्तविक स्वरूप को खो बैठा है,ख् जब वह स्वयं को जान लेता है स्वयं की स्थिति को पहचान लेता है तब उसे वास्तविकता में जिससे निकलता है उस स्वरूप को स्मरण करता है और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान कर मोक्ष गति प्राप्त करता है।
जिस प्रकार समस्त नदियंाॅं नाले और विभिन्न जल के स्त्रोत विभिन्न भागों से होकर अर्थात् छिन्न-भिन्न, ढेढी-मेढी रास्ते होकर अंत में समुद्र में आकर विलिन होकर समुद्र रूप में समा जाती है। इसी प्रकार समस्त मानव जाति विभिन्न धर्मो या भागों से होते हुए एक ही परम परमात्मा ईश्वर में आकर विलीन हो जाते है, अर्थात् ईश्वर में एकाकार हो जाता है ठीक उसी प्रकार से जैसे कस्तुरी मृग के नाभि में कस्तुरी रहती है परंतु वह नही जानता और इधर उधर उसके सुगंध से उसको पाने के लिए भटकता फिरता है, परंतु कहीं नही पाता उसी प्रकार मानव अपना मोक्ष आत्म अवलोकन करने पर समस्त अज्ञानता रूपी बंधन या परदा उनके जीवन दूर हो जाता या उठ जाता है तब पुनः अपने स्वरूप को अर्थात् ईश्वरीय स्वरूप को पहचान लेता है और आत्मा ज्ञान द्वारा ईश्वरीय रूप में विलीन हो जाता है अर्थात् ईश्वर के एकाकार हो जाता है, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
विभिन्न धर्मो में मोक्ष का उद्देश्य
संसार के समस्त धर्म मानव जीवन के चरम उद्देश्य स्वर्गीय जीवन में प्रवेश करने एवं नरक के भयानक यातनाओं से बचने के लिए धर्म ग्रंर्थो का अनुशरण एवं ईश्वर के अज्ञानताओं को मानने और जीवन में आत्मसात् करने की प्रेरणा प्रदान करना है। सभी धर्मों में आदर्शो एवं आज्ञाओं को मानने हेतु कल्याणकारी सुझाव देती है जो कि ईश्वर की आदेश मानी जाती है जिसमें चलकर मानव समसत जीवन के उद्देश्यों को पुरा करते हुए अपने अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ को प्राप्त कर सके। धर्मो के आदर्शो नियमों, आज्ञा पालन उवं समस्त उपदेश मानव को अपने व्यवहार में लाने तथा धर्म के अनुसार धार्मिक कर्मो को अपनाकर सत्य मार्ग पर चलने हेतु मार्ग प्रशस्त करता है।
धर्म के द्वारा मानव अपने जीवन में सद्गुणों का विकास करते हुए अपने व्यवहार में परिवर्तन लाता है जो उन्हें सम्मानीय एवं उच्च स्थान पर पहुंचाती है। सही ज्ञान एवं दिशा निर्देश धर्मग्रंथो के अध्ययन मनन एवं आचरण करने से प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मानव ईश्वर के स्वरूप है जो कि ईश्वर के अनाज्ञाकारिता एवं पाप के कारण उससे (ईश्वर से) अलग हो गये और उसकी दशा दयनीय है उनके ऊपर ईश्वर के क्रोध एवं श्राप व्याप्त है वह अव अपने आप में दण्ड एवं नरक के भयानक यातना के योग्य है। जब तक वह अपने अपराध एवं पापों का अंगीकरण एवं पश्चाताप् ईश्वर के सम्मुख न कर लेता तब तक उसका उध्दार या मुक्ति असंभव है वह अपराधी एवं दण्ड के योग्य है जिसका अंतिम परिणाम भयानक यातनाओं के साथ नरक में अनंतकाल तक तड़पता है।
अतः समस्त धर्मो के अध्ययन एवं उद्देश्यों से यह परिणाम मालूम होता है कि धर्म जो ईश्वर की वाणी, आज्ञा या निर्देश है जिसका उद्देश्य मानव जीवन ईश्वर के समीप पुनः आकर मुक्त हो जाए उन्हें मोक्ष मिल जाए।
उपरांेक्त वर्णन के अनुसार समस्त धर्मांे का उद्देश्य मानव मोक्ष के प्रति सार एवं निचोड़ निम्न है
जीवन के सच्चाई को जानना आवश्यक है।
मानव जीवन ईश्वर द्वारा प्रदत्त जो कि ईश्वर का स्वरूप है। मानव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर मोक्ष प्राप्त कर सके।
जीवन का चरम लक्ष्य ईश्वर में एक हो जाना अर्थात् समस्त दुःखों से छुटकर मोक्ष प्राप्त कर लेना।
मानव जीवन के कल्याण हेतु सभी पक्षों में मार्ग प्रशस्त्र करना भौतिक आत्मिक एवं आध्यात्मिक विकास आवश्यक है।
ईश्वरीय आज्ञा के प्रति आज्ञाकारिता का संदेश और नैतिक आचरण, धर्म के प्रति विश्वास प्रदान करना।
सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में उच्च गुणांे का विकास करना।
धार्मिक चेतना का विकास एवं निम्नतम् से उच्चतर लक्ष्य की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा।
समस्त मानव एवं जीव के प्रति प्रेम भावना, सहयोग भावना, विचारों को परिवर्तित कर नैतिक मूल्य एवं सद्गुणों का विकास करना।
मोक्ष का मानव जीवन में महत्व
मोक्ष के साथ तुलना मानव जीवन केे अन्य मूल्य तुच्छ है। क्योकि मनुष्य का सारा वैभव, धन, एवं गौरवपूर्ण जीवन उनको मुक्ति दिलाने में असमर्थ होती है। मानव जीवन का अंतिम एवं परम लक्ष्य संसारिक दुःखों से मुक्ति पाना है अर्थात् संसारिक समसत बंधनों से छुटकर एक ऐसी शांति जो जिसका वर्णन कर पाना असंभव है।
मानव केवल शारीरिक मुक्ति ही नहीं बल्कि आत्मा की भी मुक्ति चाहता है। वह मुक्ति की तलाश में सब कुछ छोड देना चाहता है, उसी चाहत से वह अपने आप को तसल्ली देने और सांसारिक मोह माया से आजाद होने के लिए अनेकों प्रकार के कर्म करना शुरू कर देता है। परिणाम स्वरूप वह एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाता है जो उसे पूर्णतः आत्म संतुष्टि शारीरिक आत्मा एवं मन के समस्त जिज्ञासाएं पूर्णतः होती अनुभव करता है।
मोक्ष केवल नरक से बचने या स्वर्ग में पहुचने की कोई ऐसी विधि नही है, बल्कि एक ऐसी अवस्था जो आत्म संतुष्टि की कुजी है जहाॅ पहुचकर व्यक्ति अपने समस्त वैभव, दुःख, पीडा, अपराध, पाप, पुण्य, सुख स्वार्थ, और हर प्रकार के दैहिक आदतो से मुक्त होकर जीवन के संपूर्ण बाधाओं से पार होकर अनंत आनंद की अवस्था में लीन हो, संसार से परे चिरकालीन अलौकीक संसार में स्थिर अवस्था जहाॅ पर सब कुछ शून्य है, कुछ विलीन हो जाती है, पहुंच जाती है। संसार मे मानव अपने व्यक्तित्व के लिए क्या कुछ नही करता हर प्रकार के कुकर्म या सुकर्म या अनेको चाहे बुरा हो या भला, पाप हो या पुण्य, परंतु वह अपने अंतिम गति या परिणाम के विषय में चिंतन करता है तो वह अपने आपको सबसे नीच समझने लगता है। यही आत्मा चिंतन की प्रेरणा उन्हें मुक्ति के मार्ग पर ले जाती है जहाॅ समस्त कर्मों का नाश हो जाती है उन्हें केवल छुटकारा या मोक्ष ही दिखाई पडती है उन्हें यह ज्ञात हो जाता है उनका भयानक परिणाम मिलने वाला है, इसी परिणाम से बचने हेतु वह आत्म प्रेरित हो मुक्ति मार्ग की आकर अग्रसर होता है, और संकल्प आचरण अपनाकर मुक्ति हेतु प्रयास करता है अब उसे सांसारिक वस्तुएॅ घृणित एवं तुच्छ लगती है वह संपूर्ण संसारिक शारीरिक सुखों एवं दुःखों से छुटकर पार जाना चाहता है जहां असीम शांति हो।
मानव आप ही आप मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता उसे या तो ईश्वर की शरण में जाने की आवश्यकता है या किसी धर्म के मार्ग को अपनाना होता है दृढ़ संकल्प एवं आज्ञाकारिता के द्वारा वह मोक्ष का मार्ग तय करने में सफल हो सकता है। अतः मोक्ष प्राप्ति के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है आज्ञाकारिता चाहे ईश्वर की जो धर्मो धर्मग्रंथ में पाई जाती है या फिर अपने किसी धर्म गुरू जो सच्चे मार्ग का अनुशरण हेतु प्रेरित करता है।
मोक्ष का प्रमु£ महत्व निम्नलिखित
है-
आत्म प्रेरणा जो त्याग और बलिदान हेतु प्रेरित करती है।
ईश्वर आज्ञा धर्म मान्यताओं के अनुरूप आज्ञाकारिता, आचरण।
जीवन के आकर्षण से अपने आप को अलग करने का विचार एवं आत्म चिंतन।
नैतिक मूल्य एवं मानव कल्याण हेतु आत्म चिंतन।
सांसारिक दुःखों से मुक्ति पाने हेतु मोक्ष के मूल्य को जानने की जिज्ञासा।
मानव जीवन का अंतिम परिणाम पर विचार कि आखिरी अवस्था क्या है? अर्थात् मृत्यु के पश्चात् क्या होगी?
स्वर्ग पहुचंने की जिज्ञासा एवं नरक के भयानक परिणाम से बचने हेतु धर्म का अनुशरण एक अंतिम विकल्प।
धार्मिक नैतिक, चरित्रवान, सद्गुण, जीव के प्रति प्रेम, करूणा और दयालु बनाने में सहायक।
निष्कर्ष
समस्त धर्मो एवं उनके ग्रंथों के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि मानव जीवन एक जटिल श्रृंखलाओं का प्रवाह है जिसका अंतिम लक्ष्य समस्त दुःखों का सामना करते हुए अंत में समसत सांसारिक बंधनों एवं अज्ञानता के अंधकार से मुक्त होकर पूर्ण रूप से जन्म मरण के आवागमन या बंधन से छुटकारा पाना अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना। परिणामतः सभी धर्मो एवं मान्यताओं के अनुसार मानव का जीवन अत्यंत बहुमुल्य है समस्त धर्मो में मोक्ष के अवधारणा के विषय में अलग अलग विचार केन्द्रित किया गया है। कि मानव मोक्ष प्राप्त कर हमेशा-हमेशा के लिए अर्थात् अनंतकाल के लिए समस्त बंधन चक्र से मुक्त होकर पारलौकिक या स्वर्गीय जीवन में प्रवेश कर सकता है। और यह तभी संभव है जब वह बताए गए मार्ग को अपनाकर अपने जीवन में आत्मसात् करके उनके अनुसार आचरण करें।
यदि हिन्दू धर्म में अवलोकन करें तो इनके समस्त दार्शनिक एवं ऋषियों के अलग अलग विचारों से यह परिणाम मिलता है कि समसत विचारों का केन्द्र बिन्दू मानव का मोक्ष पर आधारित है। वेद, पुराण, उपनिषद्, गीता, योग, न्याय वैशेषिक, सांख्य एवं मीमांसा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन के मुक्ति के लिए ईश्वर धारणा पर जाकर जोडती है। समस्त ज्ञान का आधार परमसत्ता पर आकर टिकता है। जैन, बैध्द धर्म अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर के उपस्थिति का परिचय देता है। हालांकि दोनो ईश्वर को नहीं मानते फिर भी अनीश्वरवादी होने के बावजूद भी ईश्वर की ओर संकेत करता है क्योकि यदि आत्मा नही है तो किसको मोक्ष मिलेगा और यदि आत्मा है तो इसका सीधा संबंध ईश्वर से है। ईश्वर एवं आत्मा को केन्द्र बिन्दु मानकर ही मानव उध्दार या मोक्ष प्राप्त कर सकता है और यदि ईश्वर या आत्मा नही तो फिर मोक्ष की अवधारणा एक निरर्थक विषय है जिसका कोई मूलाधार नही है, चाहे ईश्वर को माने या न माने यदि साधारण मृत्यु प्राप्त होता है तो जीवन को मोक्ष तो मिलता है जिसका सामान्य अर्थो में छुटकारा है।
यहूदी, ईसाई, इस्लाम, मोक्ष हेतु ईश्वर को केन्द्र मानता है तथा मुख्यतः आज्ञाकारिता एवं प्रेम से सीधे मानव का ईश्वर के प्रति प्रेम एवं भय से संबंध स्थापित कर मोक्ष हेतु मार्ग प्रशस्त करता है। पारसी धर्म के मानव मूल्य को विशेष रूप से ईश्वर के प्रति असीम प्रवित्रता को प्रकट करता है और मानव अपने कार्यो हेतु व्यक्तिगत जिम्मेदार ठहराया गया है और मुख्य रूप से पवित्रता पर बल दिया गया है। सिक्ख धर्म एक आदर्शो से पूर्ण मानव धर्म है जो मानव के प्रति ईश्वरीय प्रेम को दर्शाता है।
निष्कर्षतः इस विषय पर पुनः यही विचार कि मानव जीवन ईश्वरीय रचना है जिसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। अर्थात् अपने खोए हुए स्वरूप को पुनः पा लेना और आत्मसाक्षात्कार कर ईश्वर में विलीन हो जाना है। यह विषय ‘‘विभिन्न धर्मो में मोक्ष की अवधारणाः मानव जीवन की जिज्ञासा एवं प्रतिक्रियात्मक विचार’’ के माध्यम से यह निष्कर्ष निकलता है मानव अपने कर्मो के लिए स्वयं जिम्मेदार है तथा ईश्वरीय आदेश या आज्ञा को न मानकर पापी हो गये है और ईश्वरीय कृपा से विमुख होकर नरक के भागी है और इस भयानक दण्ड से तभी बच सकता है जब वह ईश्वर से क्षमा मांग ले और पापांे से पश्चाताप कर पुनः मेल मिलाप कर लें। अंततः ‘‘विभिन्न धर्मो में मोक्ष की अवधारणाः मानव जीवन की जिज्ञासा एवं प्रतिक्रियात्मक विचार’’ में समस्त धर्मो का केन्द्र बिन्दु मोक्ष है तथा इसका आधार ईश्वर एवं महान पुरूषों के आदर्श एवं उपदेश है। समस्त धर्म मानव कल्याण एवं उनके मोक्ष हेतु उपाय एवं मार्ग प्रशस्त करने में अपना योगदान प्रदान किया है मानव का अपनी अंतिम जिज्ञासा यही है कि वह मोक्ष प्राप्त कर सकें।
संदर्भ ग्रंथ-सूची
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7. मिश्र, हृदय नारायण (2003) ’’नीतिशास्त्र के प्रमुख सिद्धांत’’ प्रकाशक द्वारका प्रसाद अग्रवाल शेखर प्रकाशन 101 चक जीरो रोड़, इलाहाबाद
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Received on 01.09.2014 Modified on 10.09.2014
Accepted on 14.09.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 2(3): July-Sept 2014; Page 183-187